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कविता: किसी उलझन को सुलझाऊँ

किसी उलझन को सुलझाऊँ,


किसी छाँव के नीचे,

जहाँ धूप पहुँच न सके,

जीवन की उम्मीद न घटे।

वहाँ बैठ मैं जीवन की

किसी उलझन को सुलझाऊँ।


जहाँ मंज़िल न हो,

न हो कोई मुसाफ़िर,

हो तो केवल मेरा अहसास,

उस राह को पाने की चाह में

किसी उलझन को सुलझाऊँ।


हर प्रश्न बने जीवन,

और उत्तर हो केवल तुम।

न लगाव किसी विचार का,

और प्रेम का गुंजन।

उस जगह बैठ

किसी उलझन को सुलझाऊँ।


भीतर का ज्ञान हो महान,

समझ केवल इतनी-सी कि

समझ आए केवल ध्यान।

ध्यान कुछ ऐसा लगे, मानो

किसी उलझन को सुलझाऊँ।


- गजेन्द्र

 
 
 

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Mar 09
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