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Mahaprana
Gajendra G.
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Join date: Mar 8, 2026
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Mar 13, 2026 ∙ 1 min
कविता: ना किसी की आस कर
एक लंबी तू श्वास भर, और मुझ पर तू विश्वास कर। बढ़ा कदम और रख धरा पर, ना किसी की आस कर। क्यों बन रहा तू दास भर? ना दुनिया को बर्दाश्त कर। जा, चूम अम्बर के शिखर को, ना किसी की आस कर। अश्रुओं का नाश कर, शोक का तू हास कर। अब जीत का आगाज़ कर, ना किसी की आस कर। वीरों के आवास पर, आकाश के विस्तार पर, है तेरा अब इंतज़ार भर, ना किसी की आस कर। - गजेन्द्र
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Mar 8, 2026 ∙ 1 min
कविता: किसी उलझन को सुलझाऊँ
किसी उलझन को सुलझाऊँ, किसी छाँव के नीचे, जहाँ धूप पहुँच न सके, जीवन की उम्मीद न घटे। वहाँ बैठ मैं जीवन की किसी उलझन को सुलझाऊँ। जहाँ मंज़िल न हो, न हो कोई मुसाफ़िर, हो तो केवल मेरा अहसास, उस राह को पाने की चाह में किसी उलझन को सुलझाऊँ। हर प्रश्न बने जीवन, और उत्तर हो केवल तुम। न लगाव किसी विचार का, और प्रेम का गुंजन। उस जगह बैठ किसी उलझन को सुलझाऊँ। भीतर का ज्ञान हो महान, समझ केवल इतनी-सी कि समझ आए केवल ध्यान। ध्यान कुछ ऐसा लगे, मानो किसी उलझन को सुलझाऊँ। - गजेन्द्र
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